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कहानी ९९: मिलापवाले तम्बू का पर्व : यीशु का जीवन जल देना 

मिलापवाले तम्बू का पर्व शुरू हो चुका था और सब यही सोच रहे थे कि यीशु कब आएगा और इस बात कि अफवाह फैलाई गई थी कि यहूदी अगुवे उसे मरवा देंगे। वह आया और बहुत साहस और सफाई के साथ बोला।

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कहानी १०५: शास्त्रियों और फरीसियों का वही रवैया 

यीशु परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार को सुनाने के लिए यहूदिया के क्षेत्र में जाते रहे। शास्त्री और फरीसी यीशु पर आरोप लगाते रहे कि वह शैतान कि ओर से आया है। उसके दुष्ट आत्माओं को निकालने और स्पष्ट रूप से संदेश को सीखाने के बावजूद उन लोगों ने पश्चाताप करने से इंकार कर दिया।

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कहनी १११: सुंदर सत्य, सुंदर चंगाई 

यीशु जब प्रचार करते जा रहे थे, वे उन भयानक विकृतियों और झूठ को खोलते जा रहे थे जिसने लोगों को भय और झूठे विश्वास में जकड़ा हुआ था। अपने स्वर्गीय पिता के विषय में झूठ सुनकर वह कितना अपमानित महसूस कर रहा होगा!

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कहनी ११२: समर्पण का पर्व:  यीशु द्वारा जन्म से अंधे आदमी कि चंगाई 

मिलापवाले तम्बू के पर्व के तीन महीने बीत चुके थे और अब समर्पण के पर्व का समय आ गया था।एक बार फिर, सभी तीर्थयात्त्री इस्राएल देश से यरूशलेम को यात्रा के लिए जाएंगे। पिछले पर्व की घटनाएं अभी भी लोगों के दिमाग में ताजा थीं।

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कहनी ११३: समर्पण का पर्व : जन्म से अँधा आदमी फरीसियों के साथ 

फिर उसके पड़ोसी और वे लोग जो उसे भीख माँगता देखने के आदी थे, उसे देख कर हैरान हुए। वह उस व्यक्ति के समान दिखता था जिसे वे हर रोज़ देखते थे लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था? उन्होंने एक दूसरे से पुछा,“क्या यह वही व्यक्ति नहीं है जो बैठा हुआ भीख माँगा करता था?”

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कहनी ११६: पुत्र को मारने की कोशिश

जब यीशु एक अच्छे चरवाहे के विषय में बोल रहा था, उसके सुनने वाले समझे कि वह इस बात का ऐलान कर रहा है कि वह मसीहा है। वे जानते थे कि वह अपनी उन भेड़ों के लिय अपनी जान देने का दावा कर रहा है जो उसकी सुनते हैं और विश्वास करते हैं।

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कहनी ११७: स्वर्ग राज्य में पहले और अंतिम

पेरा जाने के लिए यीशु येरूशलेम और यहूदी के क्षेत्र को छोड़ कर यात्रा पर निकल पड़े। समर्पण का पर्व खत्म हो चूका था, और साढ़े तीन महीने तक यीशु येरूशलेम को वापस नहीं आएगा। वहाँ बहुत अधिक खतरा था। यहूदी यीशु को मारना चाहते थे, और जो वक़्त परमेश्वर पिता ने यीशु को नियुक्त किया था जब उसे अपने प्राण देने होंगे, वो वक़्त अभी नहीं आया था।

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कहनी १२६: लाज़र की यात्रा

यहूदी अगुवे यीशु को गिरफ्तार करने और उसे मार डालने के लिए तैयार थे। हालात हाथ से बाहर हो रहे थे। इस दुष्ट उपदेशक की लोकप्रियता खतरनाक होती जा रही थी। येरूशलेम के अगुवे अपने अधिकार और प्रभाव को जाते देख रहे थे जब सारी भीड़ यीशु की बातों पर पूरा ध्यान लगा रहे थे।

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कहनी १२७: लाजर का आश्चर्य

यीशु अपने चेलों के साथ बैतनिय्याह को गया। यह एक खतरनाक निर्णय था, जो वास्तव में नहीं था! यहूदी अगुवे यीशु को मार देना चाहते थे, और येरूशलेम छोड़ कर वह यरदन नदी को चला गया। केवल अभी के लिए, यीशु का मित्र लाज़र मर रहा था, और यीशु उसकी सहायता के लिए जा रहा था।

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कहनी १२८: दस कोढ़ी की चंगाई

यीशु ने यहूदिया और पेरी से होते हुए इस्राएल के पूर्ण देश कि यात्रा की। अब उसे येरूशलेम कि अंतिम यात्रा पर निकलना था। गलील और समरिया के रास्ते से होते हुए वह दक्षिण को फसह के पर्व को मनाने के लिए गया। बहुत से यहूदी भी इस पर्व को मनाने के लिए जा रहे थे।

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कहनी १३६: बरतिमाई और जक्कई 

यीशु यरूशलेम के निकट पहुँच रहे थे। जब तक वे यरीहो पहुंचे, उसके चेलों के साथ एक बड़ी भीड़ मिल गयी थी। पूरे शहर में ऐसी उत्साहित भीड़ को देखना एक अनोखा दृश्य रहा होगा! बरतिमाई (अर्थ “तिमाई का पुत्र”) नाम का एक अंधा भिखारी सड़क के किनारे बैठा था।

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कहानी १३९: विजयी प्रवेश

यहूदियों का फ़सह पर्व आने को था। बहुत से लोग अपने गाँवों से यरूशलेम चले गये थे ताकि वे फ़सह पर्व से पहले अपने को पवित्र कर लें। वे यीशु को खोज रहे थे। इसलिये जब वे मन्दिर में खड़े थे तो उन्होंने आपस में एक दूसरे से पूछना शुरू किया,कि आने वाले दिनों में क्या होगा।

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कहानी १४२: यंत्रणा का सप्ताह: दूसरा दिन-यूनानियों के लिए यीशु का कोई उत्तर नहीं 

यह सप्ताह का दूसरा दिन था। मंदिर में तबाही मचाने के एक पहले कि यीशु का उमंग भरी प्रवेश, पर्व के माहौल में अभी भी गूँज रहा था। यीशु अविश्वासियों के अहास में प्रचार कर रहा था, और पैसे परिवर्त्तकों को बाहर रखते हुए, पिता के पवित्र मंदिर को शुद्ध रखने का प्रयास कर रहा था।

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